डज गॉड एक्जिस्ट ?

जावेद साहब और एक मुफ़्ती के बीच हुई डिबेट पुनः गॉड के एसिस्टेंस पर चर्चा चालू कर दिया है।
वैसे इस तरह की डिबेट्स से कोई उम्मीद पालना बेवकूफी ही है। ऐसी डिबेट से मुतमईन होके कोई आस्तिक हो जाये ये भी मुश्किल है और नास्तिक हो जाये ये तो लगभग असंभव है।

जहाँ तक आस्तिक की बात है तो आप कभी भी किसी आस्तिक से बहस करके उसे नास्तिक नहीं बना सकते। आप उसके सभी तर्क काट दें, उसे एकदम निरुत्तर कर दें तब भी आप उसे अपनी आस्था से नहीं डिगा सकते। क्योंकि आस्तिक और नास्तिक की बहस असल में भावनाओं और तर्क की बहस है। तर्क का भावनाओं से जीतना लगभग असंभव है।

हमारे मस्तिष्क में जो हिस्सा भावनाओं को संचालित करता है वह उस हिस्से से कहीं प्राचीन है जो तर्क के लिए जिम्मेदार है। तर्क का प्रयोग हम अपनी सुविधानुसार करते हैं जबकि हमारा जीवन ज्यादातर भावनाओं से ही संचालित होता है। भावनाएँ ही सुख दुःख का कारण बनती हैं। अगर कोई तर्क हमारे लिए दुःख का कारण बने तो हमारा मस्तिष्क तुरंत उससे निपटने का उपाय खोजने लगता है। वहीं अगर कोई तर्क सुख का कारण बने तो उसे हम तुरंत लपक लेते हैं।

आस्तिक से नास्तिक बनने की यात्रा असल में खुद से खुद की लड़ाई जैसी होती है, जिसमें हम भावनात्मक मस्तिष्क के कारण उत्पन्न उसे बायस (पक्षपात) को समझने और उससे निपटने की कोशिश करते हैं। और ये यात्रा खुद ही तय करनी पड़ती है। कोई दूसरा ले जाये ये असम्भव है क्योंकि वहाँ भावनाओं के साथ साथ अहम भी आड़े आ जाता है।

वैसे ये भी कहीं हद तक ठीक है कि हर आदमी नास्तिक नहीं बन सकता। क्योंकि भावनाओं की जकड़ से आजाद होने के लिए हर इंसान इतना साहस नहीं जुटा पाता। आम लोग अपने जीवन की समस्याओं में इस कदर उलझे होते हैं कि अदृश्य सहारों को छोड़ने का साहस वे कभी जुटा ही नहीं सकते।

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