रात्रि चाहे कितनी ही काली हो, किंतु सूर्य के प्रथम किरणों की आभा को रोकने का सामर्थ्य उसमें नहीं। झूठ और छल के घने बादल सत्य के नक्षत्र को क्षणिक आच्छादित अवश्य कर सकते हैं, किंतु सदा के लिए उसका तेज हर लेना उनके वश में नहीं।
कपट का सिंहासन क्षणभंगुर होता है। मिथ्या के महल रेत पर टिके होते हैं, जिन्हें सत्य की पहली ही लहर ध्वस्त कर देती है। छल का वितान चाहे कितना ही विस्तृत क्यों न हो, सत्य की वायु उसे तिनके-तिनके कर बिखेर देती है। जिनकी आत्मा निर्मल है, जिनका पथ उज्ज्वल है, उन्हें कुचक्रों की छाया भले ही आच्छादित करे, किंतु पराजित नहीं कर सकती।
जो लोग छल के तंतु बुनते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि समय की गति अटल है। झूठ को जितना भी ओढ़ लिया जाए, अंततः सत्य का सूर्य हर आवरण को भेदकर अपनी प्रभा बिखेर ही देता है। विष से सिक्त शब्द सत्य को आहत करने का प्रयत्न अवश्य कर सकते हैं, परंतु सत्य का कंठ अमृत से आप्लावित होता है—वह झूठ के विष से कभी भी कलुषित नहीं होता।
यह कालचक्र साक्षी है कि जब-जब असत्य ने सत्य को दबाने का प्रयास किया, तब-तब सत्य ने सहस्रगुनी शक्ति से प्रज्वलित होकर असत्य को परास्त किया। इतिहास ने अनगिनत बार यह सिद्ध किया है कि मिथ्या आरोपों की अग्नि में सत्य झुलसता नहीं, अपितु कुंदन की भांति निखर जाता है।
अब बस समय की प्रतीक्षा है। भ्रम के घटाटोप छँटेंगे, न्याय का सूर्य उदित होगा और जिनका अंतर निर्मल है, उनकी जयघोष धरा और गगन दोनों में गूँज उठेगी। सत्य मौन रह सकता है, पराजित नहीं। वह विलंबित हो सकता है, पराजय उसके भाग्य में नहीं।