प्रेम और सपने

जाने क्यों पर मुझे ये लगता है कि प्रेम का देवता हमेशा मुझसे नाराज ही रहा है..मुझे अक्सर प्रेम मिलते मिलते रह गया..जब भी कभी मुझे प्रेम हुआ तो लगा जैसे मेरे प्रेम रूपी पतंग की डोर कटी ना हो, बस मेरे हाथों से फिसल गई..मुझे आप प्रेम की दुनिया में अभागे प्रेमी का किरदार दे सकते हैं चाहें तो..मेरे हिस्से जो आया वो थी मेरी हिम्मत, पर अपार हिम्मत होने के बाद भी जिंदगी में प्रेम का न होना हमारी हिम्मत को बौना साबित करता है..

वास्तव में जिसके पास दौलत नहीं है उसे लगता है कि काश उसके पास दौलत होती, जबकि उसे ये प्रार्थना करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसे दौलत के साथ साथ प्रेम भी मांगना चाहिए ईश्वर से..ईश्वर ने हमेशा मनुष्य की मांगों के साथ छल किया है, जैसे अहिरावण के साथ नींद का..आप कहेंगे कि वो राक्षस था, उसके साथ ऐसा होना जरूरी था, फिर आप माता देवकी को क्या कहेंगे, जिन्होने ये मांगा था कि आप अगले जन्म में मेरी कोख से जन्म लेना, बिलकुल ईश्वर ने उनकी सुनी, पर किस कीमत पर ये किसी से नहीं छुपा है..इसीलिए जब भी आप ईश्वर से धन दौलत मांगे तो साथ ही प्रेम भी मांगिए..

ख़ैर, मुझे हिम्मत के साथ एक और चीज मिली, वो है क्रोध..क्रोध वो श्राप है जो प्रेम से लेकर दुनिया के किसी भी रिश्ते को निगल जाता है..मुझे एक बार प्रेम हुआ, और ऐसा वैसा नहीं..मुझे लगने लगा कि मैं ही अगला रांझा कहलाऊंगा..जिससे मुझे प्रेम हुआ वो सच में हीर थी..परंतु मेरे क्रोध ने इस रिश्ते को निगल लिया..फिर कभी मेरी जिंदगी में प्रेम नहीं लौटा..न तो प्रेम के देवता को मुझ पर तरस आया और न मेरे ईश्वर को..मैं भटकता रहा..ढेर सारा प्रेम लिए..हर वक़्त बहुत से लोग मेरे आस पास ही होते हैं, पर मैं उनको नहीं बता सकता हूँ कि मैं असल में कितना तन्हा हूँ..

मैंने प्रेम के देवता को सोने के कड़े चढ़ाने के वादे किए, तो कभी हीरों से उसका मुकुट बनवाने के वादे, पर उसने मेरी एक न सुनी..लगता है जैसे उसने मुझसे मुँह फेर लिया है, जैसे वो नींद में होने का बहाना करता है जब मैं उसके दरबार में अपनी अर्जी लगाता हूँ, और सोते हुए को जगाया जा सकता है, पर जो सोने का अभिनय कर रहा है उसे भला आप कैसे जगाएंगे..

मैंने मृत्यु के देवता से भी गुहार लगाई कि अगर मुझे प्रेम नहीं मिल सकता है तो मृत्यु दी जाए..तब प्रेम के देवता ने अपने सिंहासन से तुरंत उठ कर कहा
“नहीं, इसे मृत्यु देना उचित नहीं है, मृत्यु इसके लिए कोई दंड नहीं बल्कि वरदान जैसी होगी, इसने जिसका दिल दुखाया है, और जितना दुखाया है उस हिसाब से इसे अभी अनंतकाल तक ऐसे ही बिना प्रेम के इस संसार में भटकना होगा”
मुझे उस रोज उसकी इस बात का दुःख कम हुआ कि प्रेम के देवता ने ऐसा कहा, मुझे इस बात की खुशी थी कि कम से कम उसने मेरी बात तो सुनी..

अब मैं भटकता रहता हूँ, मैं जानता हूँ कि जब तक मेरे गुनाहों की सजा पूरी नहीं हो जाती, मुझे प्रेम नहीं मिल सकता, पर मैं कोशिश करता रहता हूँ..अपने क्रोध पर नियंत्रण पाने की कोशिश, प्रेम पाने की कोशिश..हर बार मैं असफल ही होता हूँ..आप मुझे इस प्रेम की दुनिया का सबसे अभागा किरदार मान सकते हैं..!

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